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पहला सुख - निरोगी काया, दूजा सुख घर में हो माया


"काया राखेधरम,

पूँजी राखे व्यवहार"


लिखने एवं स्मरण कराने का एकमात्र उद्देश्य यही है कि आज की जीवन शैली में, बदलते परिवेश में हमकिस प्रकार अपनेशरीर को स्वस्थरखे? हमनेअपने बुज़ुर्गों से सुना और देखा भी कि "सौ" उनके लिये केवल एक अंक रहा है । उनके शरीर का इस अंक से कोई लेना -देना नहीं था । अब हम नई पीढ़ी के लोग ज़रूर कारण जानने के लिये उत्सुक होंगे और वह थी उनकी प्राकृतिक जीवन शैली उनका खान-पान जो ना केवल उन्हें स्वस्थ रखता था बल्कि उन्हें नवीन कार्यों के लिये नवीन ऊर्जा भी देता था । हमारे बुज़ुर्गों ने अपने शरीर को परमात्मा की देन माना और शरीर को स्वस्थ रखना अपना नैतिक कर्तव्य। वर्तमान तकनीकी युग में जिस प्रकार की जीवनशैली हम जी रहे है उससे हमारे दिन और रात दोनों ही विपरीत दिशा में चल रहे है । बच्चे, युवा, बुज़ुर्ग तीनो वर्ग ही इस चौबीस घन्टो की चक्की में पिस रहे है ।बच्चों को प्रतिशत की, युवाओं को स्वयम् को सिद्ध करनेकी और बुज़ुर्गों को अपने अनुभव परख ने की, सभी में एक होड़ सी मची हुई है और इन सभीका परिणाम केवल एक "तनाव" जो कि शारीरिक एवं मानसिक दोनों ही प्रकार का हो सकता है । अब प्रश्न यह उठता है कि हम इस तनाव से कैसे बचें ,अपने तन और मन दोनों को ही कैसे स्वस्थ रखे ?


उत्तर हमारी भारतीय सनातन संस्कृति के पास ही है "प्राणायाम, व्यायाम, अच्छा खान - पान एवं प्राकृतिक जीवन शैली " । यदि मनुष्य का शरीर सशक्त है तो वह हर क्षेत्र में सफ़लता प्राप्त कर सकता है। अपना स्वास्थ्य खोकर यदि हम सम्पति प्राप्त कर भी रहे है तो ऐसी सम्पत्ति का होना व्यर्थ ही है । ध्यान रखे "बाज़ार में दवाइयाँ मिल सकती है पर स्वास्थ्य नहीं "


अच्छा स्वास्थ्य ना हमसे कोई छीन सकता है ना ही चुरा सकता है परन्तु सीख ज़रूर सकता है। संसार के "सात सुखों" को लेकर श्री भोलेनाथ शुक्ल जी ने भी लिखा है कि;


"पहलासुख, निरोगीकाया, दूजासुख घर मेंहो माया"


अर्थात् यदि काया निरोगी है तो माया अर्थात् धन सम्पति जिसके पीछे हम सब भाग रहे है वह अपने आप आयेगी। हमें केवल अपनी जीवन शैली में परिवर्तन करना होगा। कृत्रिम से प्राकृतिक की ओर बढ़ना होगा तभी हम अपने परिवार की, समाज की, देश की सेवा पूर्ण रूप से कर पायेन्गे, जितना हमने लिया हम अपने परिवार को, समाज को, देश को वापस लौटा पायेन्गे । प्रभुसे यही प्रार्थना है;


सर्वे भवन्तु सुखिनः सर्वे सन्तु निरामयाः,

सर्वे भद्राणि पश्यन्तु मा कश्चिद् दुःख भाग्भवेत्।



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